आत्म शुद्धि से आत्म उन्नति

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गहरी आंतरिक शुद्धि क्रिया

प्रथम दिवस

नमस्ते, आज मैंआप सभी के साथ इस विशेष विषय- गहरी आंतरिक शुद्धि क्रिया पर चर्चा करना चाहूंगा।आज बुद्ध पूर्णिमा नामक त्योहार हैऔर एक बहुत महत्वपूर्ण दिन है, आत्मउन्नति के मार्ग परआगे बढ़ने के लिए। यह हमारे शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म और ज्ञानोदय दिवस और महा परिनिर्वाण दिवस भीहै। यह दिन बहुत शक्तिशाली है और क्योंकि कुछ परिस्थितियां बनती हैं  जो वैसाख पूर्णिमा के अवसर पर होती हैं,इसीलिए इसे वैसाख त्योहार भी कहा जाता है। यह कई प्रकार की प्राप्तियों के लिए भी एक शुभ दिन है, लेकिन प्राप्त करना केवल तभी हो सकता है जब आप एक सुपात्र बन जाएं – एक योग्यव्यक्ति। इस ब्रह्माण्ड में बहुत कुछ ऐसा है जिसे हम तब अनुभव कर सकते हैं जब हम अपने सच्चे आत्म स्वरुप और ब्रह्मांड के बारे में जागरूक हो जाएँ।

किसी विशेषचीज का स्वागत करने के लिए हमें एक शुद्ध चेतना की आवश्यकता होती है। यह बहुतायत को आकर्षित करने का एकमात्र तरीका है। इसलिए आज हम अवांछित गंदगी की नकारात्मकता को दूर करेंगे। भावनाओं की नकारात्मकता, अपराध, भयआदि। ज्ञात और अज्ञात – कई प्रकार की नकारात्मकता जो प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से हमारे भीतर हैं जिसे आप केवल अंतर्मन की  गहराईओं में ही देख सकते हैं हम उसको को दूर करेंगे।

गहरी आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया के माध्यम से हम अपनी शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक भावनाओं को दूर करेंगे जो हमारे गहरे अवचेतन मन पर रहती हैं। जब जब हमारे जीवन में विपरीत परिस्थतियाँ आती हैं जैसेकि COVID 19, आर्थिक या राजनीतिक तौर पर विपरीत या मुश्किल समय, लोग अपने-अपने घरों में हैं और नहीं जानते कि क्या करना है। न जाने क्यों बहुत सारे विचार हैं जो आकाश में बादलों की तरह हमारी चेतना में पनपते हैं। आकाश में बादल हमारी नग्न आंखों के माध्यम से देखे जा सकते हैं क्योंकि आकाश बाहर है लेकिन वास्तव में एक आकाश हमारे अंदर भी है जिसे हम जागृत नहीं कर रहे हैं। इसलिए अगर हम देखें तो विचार बादलों की तरह हैं। निश्चित नहीं हैं, वे चलते रहते हैं और किसी विशेष स्थान पर नहीं रहते हैं। यह हमारी चेतना में विचार के समान है। समस्याएं तब पैदा होती हैं जब हम खुद को एक विशिष्ट विचार से जोड़ लेते हैं। ये विचार अच्छे या बुरे हो सकते हैं। यह कुछ मायने नहीं रखता कि विचार अच्छे हैं या बुरे। विचार विचार हैं। यहां तक ​​कि बुद्ध ने कहा कि वर्तमान क्षण में जीने के लिए एक विशेष विचार से चिपके बिना जीवन जीना है। यही सही तरीका है जीवन जीने का जिसे हम अक्सर चैतन्यता (मिंडफुल्नेस्स) से जीवन जीना कहते हैं।

चैतन्यता (माइंडफुलनेस) का सीधा सा मतलब है कि अपने पूरे जीवन को एक ही क्षण में एक साथ लाना और हर चीज का पर्यवेक्षक (दृष्टा) बनना। जब हम ऐसा करते हैं तो हमबहुतायत चेतना को आमंत्रित करतेहैंऔर अपने उनविचारों से दूर करते हैं जिन्होंने   हमारे मन में भय और अपराध भाव पैदा किया है।इसलिए गहरी आंतरिक शुद्धि की प्रक्रिया के माध्यम से सभी नकारात्मक भावनाओं को दूर करके हम किसी ऐसी चीज को आमंत्रित करते हैं जो इस दुनिया की नहीं है। जो कुछ असाधारण है। इसलिए यदि आप वास्तव में आमंत्रित करना चाहते हैं जो असाधारण है तो हमें कुछ ऐसा करना होगा जो असाधारण हो। और उस असाधारण चीज को गहरी आंतरिक शुद्धि कहते हैं।  बुद्ध पूर्णिमाके इस सेसप्ताह हम वैशाख के उस क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं जो बुद्ध पूर्णिमा से ६ – ७ दिन पहले का है और इस समय में ऊर्जा खुद पर काम करने के लिए बहुत सकारात्मक है। कम प्रयास से हम अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं और इन सभी अवांछित, विषाक्त भावनाओं को साफ कर सकते हैं जो हमारे जीवन में परेशानी पैदा कर रहे हैं। इसलिए बहुत से लोग यह सवाल पूछते हैं कि हम जानते हैं कि यह हमारे लिए उचित नहीं है लेकिन फिर भी हम इसका अनुसरण करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि चैतन्यता में कमी है। आत्म विस्मृति की प्रकृति जिसके कारण जागरूकता कम हो जाती है। और चैतन्यता(माइंडफुलनेस) के साथ जब  हम भूलने की बीमारी को छोड़ देते हैं – हम उसी क्षण बहुत सचेत और जागरूक हो जाते हैं।

तो हमारा जो चित्त है वो इस क्षण जो वर्तमान का क्षण है उसमें पूरी चेतना, एक वर्तमान के क्षण के साथ  है।जब उसमें हम जी रहे होते हैं तो जितने भी हमारे विचार हैं जो पूर्व की स्मृतियाँ हैं और जो आगामी घटनाएं हैं उनके जो ख्याल हैं हम उनसे पूरी तरह से मुक्त रहते हैं।  और इसी मुक्त रहने की कला को शाक्य मुनि बुद्ध ने वर्तमान में जीना बताया है।

चैतन्य हो के जीना। और जब ऐसे जी रहे होतें है तो जो भी द्वन्द हैं, विकार हैं, जो धुल के समान हैं, जो बादलों के  समानहैं,वो बादल हट जाते हैं। जो  आकाश रूपी चित्त में बादल के समान है उनसे जब हम एक दूरी बना लेते हैं तोअनंत का आकाश जो हमारे भीतर है   उस पर आने जाने वाली जो परछाइयां हैं उनको हम एक साक्षी भाव से देखते हैं।

और जब हम ऐसी अवस्था पर पहुँचते हैं तो हमारा जो स्वभाव है वो साक्षी भाव मात्र रह जाता है।  और वो  सहायक  होता है हमें पूरी तरह उस क्षण में जीने में।  अब हम जो यात्रा शुरू करेंगे गहरी आंतरिक शुद्धिके साथ जिसमें हमारे चित्त में जो अनेकानेक बाधाएं हैं,  वृत्तियाँ हैं जो रोकती हैं हमको, आज हम उनसे मुक्त होने की यात्रा की शुरुवात करेंगे।  तो आज कल और परसों ये जो तीन दिन का समय हमने निर्धारित किया है, इस समय हम सभीबैठते हैं बिना परेशानहुए की क्या और कैसे करनाहै।यह पूरी पद्धति समझाई जाएगी, निर्देशित की जाएगी और मैं आपको समझाऊंगा कैसे करना है। बहुत सारे नए लोग भी हैं उनके लिए यहनिर्देशहैकि आपको बस उस क्षण में मौजूद रहना है। आपकी जो मौजूदगी है वो महत्त्वपूर्ण है। इस समय  एक शुभ संकल्प और लेंगे की हम जो यह सत्कर्म करने जा रहे हैं इसमें हम और भी लोगों को जोड़ेंगे।  भागीदार बनाएंगे जिससे वो भी अपने जीवन में एक सकारात्मकता लाएं।

गहरीआंतरिक शुद्धि क्रिया

द्वितीय दिवस

सभी को नमस्ते!

आज हम सभी गहरी आंतरिक शुद्धि क्रिया के द्वितीय  दिवस मेंआगे बढ़ेंगे। मुझे लोगों से गहरी आंतरिक शुद्धि प्रक्रिया के बारे में कई संदेश मिलते रहते हैं।यहक्रिया आपके अवांछित, विषैले, नकारात्मक भावों को नीचे लाने की एक प्रक्रिया है जो आपको लगातार पीछे खींचते हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से हम अपने भीतर के सभी अवांछित कणों को जाने देते हैं जो भीतर रखने के योग्य नहीं हैं। इससे पहले कि हम द्वितीय  दिवस के लिए आगे बढ़ें, हमें कुछ चीजों को समझना होगा।

इस समय यह गहरी आंतरिक शुद्धिबहुत महत्वपूर्ण और आवश्यक है क्योंकि इस प्रक्रिया के माध्यम से हम अंदर से खालीहो जाते हैं, और खालीपन का अपना गुण है। इसलिए आपको वास्तव में यह समझने की ज़रूरत है कि आप अंदर से कैसे हैं। आपके भीतर की जो गुणवत्ता है  उसके माध्यम से ही आप अंदर से निर्धारित करेंगे कि आप किस प्रकार की ऊर्जा के साथ जुड़ेंगे। हम उन ऊर्जाओं कोआकर्षित करते हैंजो हम अंदर से स्वयंहैं । गहरी आंतरिक शुद्धिप्रक्रिया के साथहम खाली हो जाते हैं। खोखलापन जो शुद्धि प्रक्रिया का परिणाम है, हमें सर्वोच्च के साथ जुड़ने की अनुमति देता है। ब्रह्मांड, उच्च ऊर्जा या जो भी नाम हम इसे देनाचाहते हैं, आप केवल तभीउन उच्च ऊर्जाओं के साथ एक हो सकते हैं यदि आप अंदर से खाली हैं। यदि आप सकारात्मक ऊर्जा पैदा करना चाहते हैं, तो सकारात्मक ऊर्जाओं पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय आप अपने भीतर की नकारात्मकताओं पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं ताकि आप उन सभी को हटा सकें और एक बार जब आप इन सभी नकारात्मक तत्वों से दूर हो जाते हैं तो आप बहुत जीवंत और उज्ज्वल बन जाते हैं। यह उन उच्च ऊर्जाओं से जुड़ने का तरीका है।

यह बुद्ध पूर्णिमा से पहले वैशाख सप्ताह के६,७दिनहैं।ये बहुत ही शुभ दिन हैं और अमूल्य हैं। इसलिए, यदि आप इस अवधि को समझते हैं, तो इस समय का उपयोग करें और इससे कुछ सकारात्मक बनाएं जिससे आप अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं। आज हम जो गहरी आंतरिक शुद्धिक्रिया करेंगे, वह हम सभी को अगले स्तर पर ले जाने के लिए प्रभावित करेगी।हमने कल भी कुछ हद तक इसका अनुभव किया। चूंकि कल पहला दिन था, इसलिए मैंने इसे आसान बना लिया। आज हम गहन क्रिया जारी रखेंगे।आंतरिक स्व  की शुद्धि करने के लिए पहला कदम दूसरों के लिए अच्छे और सकारात्मक विचार सोचना है। यह एक इरादा है। जो इरादा हम अंदर से पैदा करते हैं, वह वास्तव में अंदर से हमारी चेतना का प्रतिबिंब है। अगर हम दूसरों के लिए कल्याणकारी और खुशहाल जीवन जीने की सोच रहे हैं तो हम उसी अनुभव को आकर्षित करेंगे। आप किसी की मदद करने के लिए भी माध्यम बन सकते हैं। सबसे अच्छी बात जो आप किसी को पेश कर सकते हैं, वह है उनके बारे में बदलाव लाना, सकारात्मक बदलाव। और जब आप किसी की मदद करने का माध्यम बनते हैं, तो आप बहुत ही नेक काम करते हैं। जब हम किसी को विकसित करने में मदद करते हैं तो यह भगवान का काम करने जैसा है  इसलिए आज गहरी आंतरिक शुद्धिकी प्रक्रिया के माध्यम से हम अपने शरीर से विषाक्त पदार्थों को हटाएंगे – अपने शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक स्व से। यह वास्तव में विषहरण की प्रक्रिया है। हम जानेअनजानेमेंइतनी नकारात्मकता जमा करते हैं। हाल ही में हम पर्यावरण में बहुत सारे प्रदूषकों से गुजरे हैं। इतना प्रदूषण और पी ऍम स्तर बहुत अधिक था, खतरनाक स्थिति के स्तर से अधिक था।

जब आप बाहर जाते हैं तो आप अपने फेफड़ों में प्रदूषकों, धूल आदि को जमा करते हैं। हमारा ऊर्जा शरीर इसी तरह से कार्य करता है। जब हम बाहर जाते हैं, तो हम कई लोगों से मिलते हैं। हम जिन्हें नहीं पहचानते उनके भी सान्निध्य  में आते हैं।   लोग सभी तरह की ऊर्जाओं से भरे होते हैंऔर हमारी आभा बहुत संवेदनशील होती है। जब हम ऐसे लोगों और उनकी ऊर्जा के संपर्क में आते हैं तो हम उसे अवशोषित करते हैं और उसी के साथ एक हो जाते हैं। फिर हमें नहीं पता कि क्या करना है। हम उदास महसूस करने लगते हैं,  मिज़ाजबदलता है और जागरूकता की कमी के कारण हम इसका कारण नहीं खोज पाते हैं। विषहरण की प्रक्रिया के माध्यम से, आप अवांछित चीज़ों का पता लगा सकते हैं। आप उन चीज़ों को जाने दे सकते हैंजिन्हें कुछ महीनों या वर्षों से हो सकता है कि हम अपने अंदर स्थान दे रहे हों। यह वह समय है जब आप अपने बारे में सोच सकते हैं। यह लॉक डाउन वास्तव में बहुत सकारात्मक है। यह एक वरदान है। यदि आप सकारात्मक सोचते हैं तो यह लॉकडाउन वास्तव में एक वरदान है। इस लॉकडाउन में जब हम पूरी तरह से खुद के साथ होते हैं,  हम हर पल अपने विचारों और भावनाओं का पालन करते हैं। यह वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से हमारी पूरी प्रणाली काम कर रही है और हम सीखते हैं कि हमारे लिए क्या उपयुक्त औरक्याअनुचित है। हम खुद के साथ पूरी तरह से हो सकते हैं और हम खुद को इस बोझ से रहित कर सकते हैं।  संतुलित होने की प्रक्रिया के माध्यम से हम वास्तव में चेतना में बहुतायत को आकर्षित करते हैं। यह इस दुनिया में और आध्यात्मिक रूप से भी विकसित होने का सही तरीका है। एक सच्चा, आध्यात्मिक जीवन वही है जब आप आत्म चिंतन करते हैं और गहराई तक जाते हैं और इस गहराई तक जाने और आत्म चिंतन का परिणाम आत्म-विकास है। आत्म-विकास तब होता है जब आप गहराई में जाते हैं और आप इस पर चिंतन करते हैं कि क्या किया जाना चाहिए। यह पूरा जीवन एक सीखने की प्रक्रिया है और उस प्रक्रिया से हमें पता चलता है कि हम वास्तव में कैसे जी रहे हैं और हम क्या कर रहे हैं।

गहरी आंतरिक शुद्धि क्रिया

तृतीय दिवस

आप सभी के भीतर विराजमान दिव्यता को मेरा प्रणाम।  आज हमआत्म शुद्धि के तीसरे दिवस की चर्चा करेंगे। यह आने वाले बुद्ध पूर्णिमा के अवसर की तैयारी में हम करतेहैं। यह जो आत्म शुद्धि है यह कई मायनों में बहुत आवश्यक है।  एक छोटी सी कहानी के साथ मैं आज की शुरुवात को आगे बढ़ाना चाहूंगा।

जीवन में जो कठनाइयाँ आती हैं और जो असमंजस्य की स्थितियां होती हैं इन्हीं के कारण हमारे जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटित होती हैं जिनसे एक नया आयाम निकल कर सामने आता है।  और जब हम उन नए पहलुओं को समझने की कोशिश करतें हैं तभी हमारे जीवन में जो उस समय की सार्थकता है वो सिद्ध हो पाती है।  एक कहानी के माध्यम से मैं यह बात आपके समक्ष रखना चाहूंगा।

एक कक्षा में एक प्रोफेसर थे।  जैसे ही कक्षा शुरू हुई उन्होंने अपने एक विद्यार्थी से पूंछा कांच का गिलास हाथ में लेते हुए की इसका वजन क्या है।  तो सबने उत्तर दिया, पचास ग्राम, सौ ग्राम, सवा सौ ग्राम।  यह सुनकर वो प्रोफेसर शांति से बैठ गए और फिर उन्होंने सबसे पूंछा कि यदि मैं इस गिलास को हाथ में लिए रहूं तो क्या इसका वजन बढ़ या घट सकता है।  तो सबने उत्तर दिया की ऐसा तो असंभव है।  जो वजन है उस गिलास का वही रहेगा।  तो उन्होंने एक विद्यार्थी को बुलाया और कहा कि तुम इस गिलास को पकड़ कर खड़े रहो।  वो विद्यार्थी खड़ा हो गया।  फिर कुछ मिनट बीते वह वैसे ही खड़ा रहा।  कुछ मिनट बाद उसे कुछ भारी सा लगने लगा तो उसने प्रोफेसर से कहा कि अब मुझे कुछ वजन सा महसूस हो रहा है।  लेकिन तब भी उन्होंने आज्ञा नहीं दी गिलास को नीचे रखने की।  तो वो विद्यार्थी वैसे ही खड़ा रहा और कुछ समय बाद देखते ही देखते उसकी जो मांसपेशियां थीं उनमें दर्द होने लगा। उसने कहा की अब मेरे हाथ में इतना दर्द हो रहा है कि यह अब मुझसे पकड़ा ही नहीं जा रहा।  और एक समय पर इतना दर्द हो गया कि उसने तुरंत हाथ नीचे रख दिया।

यह जो स्थिति है वास्तविकता में यदि इसको देखा जाए तो यह जो बोझ है, यह बोझ हमारे विचारों का है।  ऐसा विचार जिसका हमारे जीवन में कोई ख़ास महत्व नहीं है जब हम उस विचार को बहुत देर तक पकड़े रहते हैं तो एक समय पर उसका वजन इतना ज्यादा हो जाता है की जो वास्तविक वजन से कई गुना ज़्यादा दिखने और महसूस होने लगता है।  और इसी वजन और दबाव के कारण हमारी बुद्धि इतनी मंद हो जाती है की हमें समझ नहीं आता की क्या करें।  जब हम अपने विचारों के ऊपर नियंत्रण नहीं रख पाते तो एक समय ऐसा आता है कि हम हाथ सामने पसार कर बिल्कुल मरने जैसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।

विचारों को शुद्ध कैसा रखा जाए?  एक घर है, घर के अंदर यदि झाड़ू न लगायी जाए तो घर कितना गन्दा हो जायेगा। ऐसे ही यह जो हमारा शरीर है यदि इसमें हम कूड़ा इकठ्ठा करते रहें और झाड़ू न लगाएं तो इसका हाल भी कैसा हो जायेगा।  हमें यह समझना चाहिए कि यह जो आत्म शुद्धि की प्रक्रिया है हमारे लिए बहुत ही आवश्यक है।  यह कोविड महामारी का समय है जिसमे लोग बहुत ही घबराये हुए हैं, जाने अनजाने में हम बहुत कुछ एकत्रित कर रहें हैं, बहुत कुछ अपने भीतर भर रहे हैं।  काफी चीज़ें ऐसी हैं जिनको भरने की जरूरत नहीं है लेकिन फिर भी भर रहे हैं।  तो जब हम इतनी सी जगह में कई चीज़ें डालने की कोशिश करतें हैं तो उसकी स्थिति फटने सी हो जाती है।  हमारा जो मस्तिष्क है उसकी ऐसी रचना है कि जब तक उसको खाली नहीं छोड़ा जायेगा, उसको समय नहीं दिया जायेगा शांत रहने का तब तक वो अपनी  पूर्ण क्षमता से कार्य नहीं कर पायेगा  जितनी उसकी क्षमता है।

इसलिए इस चीज़ को समझना चाहिए कि कौन सी ऐसी आवश्यक चीज़ें हैं जिनके बारे में चिंतन हो और कौन सी ऐसी आवश्यक चीज़ें हैं जिनको मस्तिष्क से बाहर निकाल दिया जाए।  लेकिन हम ठीक इसके विपरीत करतें हैं।  जो हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं हैं हम उन्हीं को सोचते हैं और जिन चीज़ों के बारे में हमको समझना चाहिए उनके बारे में हम बात करना ही भूल जाते हैं।  जैसे की हम बहुत सारी चिंताओं से ग्रसित हैं लेकिन उनसे निपटने के लिए जो आत्म शुद्धि की प्रक्रिया है, ध्यान का मार्ग है या स्वयं के अंदर की जो यात्रा है उनके बारे में हम विचार करते ही नहीं हैं।

यह जो तीन दिन का लाइव कार्यक्रम रखा गया है उसकी पूरी चेष्टा यही है की स्वयं के भीतर झाड़ू लगायी जाए जिससे अंदर की सारी मलिनता को बाहर निकाल कर फेंका जाए।  और सफाई के बाद जो निपट सत्य है, जो शाश्वत सत्य है उसके दर्शन हो सकें।  बुद्ध पूर्णिमा सात मई को आ रही है। यह बहुत ही शुभ दिन है।  इन दिनों में हम थोड़ा सा श्रम कर लेते हैं तो उस थोड़े से श्रम का कई गुना लाभ मिल जाता है हमें।  इस समय विचारों और स्वयं के ऊपर काम कर लिया जाए तो हम सक्षम बनते हैं स्वयं की उन्नति कर सकते हैं।  उस उन्नति के कार्य में एक बहुत बड़ा आत्म परिवर्तन छुपा हुआ है।  इस उन्नति का दूसरा चरण है आत्म परिवर्तन।  हम मंज़िल की बातें बहुत करते हैं लेकिन अभी हमने चलना शुरू नहीं किया।  और मंज़िल तक वही पहुँच पाता  है जो चलना सीख पाता है।  चलते रहना भी एक बहुत बड़ी कला है।

आत्म शुद्धि के तीसरे दिन मेंआगे बढ़ते हुए कुछ बातें समझनी आवश्यक हैं।  जब हम इस आत्म परिमार्जन के मार्ग पर चलते हैं तो हमारा चित पवित्र होने लगता है।  जब यह पवित्रता की ओर बढ़ता है उस समय हमें उस जगह रहना चाहिए जहाँ सकारात्मक ऊर्जा है, जहाँ से हमारी चेतना किसी प्रकार से अपवित्र न हो, दूषित न हो।  क्यूंकि यदि एक घर साफ़ है तो आप जब उसमें कदम रखते हैं तो आपको इस बात का बहुत ध्यान रखना पड़ता है कि आपके बहार के कीचड़ के कदम उस कमरे को खराब न कर दें।  इस प्रकार जब हम यह शुद्धि कार्य कर रहे होते हैं हमारे चित की दशा भी बिल्कुल नयी नवेली होती है । उस समय हमारे जो विचार हैं उन विचारों पर बहुत निगरानी रखनी चाहिए।  बहुत सोच समझ कर कदम रखना चाहिए।  जो सकारात्मक व्यक्ति हैं उनका साथ रखना और अपने लिए जो भी अच्छा सोच सकतें हैं,  कुछ रचनात्मक सोच सकते हैं उसी के बारे में चिंतन करें। जहाँ लगता हो की इस व्यक्ति से बात करके हमारा चित मलिन हो सकता है वहां पर उस व्यक्ति से थोड़ी सी दूरी बना ली जाए।

क्यूंकि बुद्ध भी अपने वचनों में यही कहते हैं की कोई आपका मित्र न हो कोई बात नहीं।  लेकिन यदि आपका एक भी शत्रु है तो वो आपके इस ध्यान के मार्ग में, आध्यात्म के मार्ग में बाधा बन सकता है।  जहाँ सौ मित्र आपको इतना नुक्सान नहीं पहुंचा सकते वहां एक शत्रु आपको कहीं अधिक नुक्सान पहुंचा सकता है।  और यह मित्र और शत्रु स्वयं हमारे भीतर ही हैं।  जो हमारी सकारात्मक सोच है वो मित्र और नकारात्मक सोच हमारा शत्रु है।  यदि ऐसी सोच है जो हानि की बात करती है, जो हमारे विनाश की सोचती है वो सबसे बड़ी नकारात्मक सोच है और सबसे ज़्यादा नुक्सान देह भी वही है।  सब स्वयं के भीतर ही है।  इसलिए बहुत जागरूकता के साथ हमें यह पता होना चाहिए की यदि हम स्वयं के ऊपर कोई काम कर रहें हैं जिससे हम आध्यात्मिक यात्रा में आगे बढ़ें तो हमारा वातावरण और हमारी संगत कैसी हो।  हमहीं हैं जो अपना वातावरण निर्णित करतें हैं।  उस निर्णय में भी हम जागरूक हों।  हमें पता हो की कहाँ हमारे लिए शुभ है और कहाँ अशुभ।

इस प्रकार हम अपने गुरु द्वारा निर्देशित इस मार्ग पर चलें और आत्म शुद्धि द्वारा आत्म ज्ञान की और अग्रसर हों।

ऐसी शुभकामनायों के साथआप सभी को सप्रेमआशीर्वाद।

 


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