गायत्री साधना द्वारा पूर्ण चैतन्यानंद की प्राप्ति

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नमस्ते।  आप सभी का प्रेम पूर्ण अभिनन्दन।  आज का दिन बहुत ही शुभ और दिव्य है।  यह गायत्री साधना की तिथि अपने आप में एक खूबसूरत और शुभ दिवस है।  लोगों के मन में इसको लेकर बहुत से प्रश्न भी हैं कि यह क्या है और हम किस प्रकार इसकी तैयारी करें।  हमारे निजी जीवन में यह किस प्रकार का प्रभाव डालेगी।  काफी लोग हमारे साथ जुड़े हैं तो एक बहुत ही गहरी बात आप सभी को बताना चाहूंगा इस सत्र की शुरुवात करने से पूर्व।  काफी समय से मेरी एक निजी इच्छा थी कि आप सभी लोग यह साधना करें।  लेकिन मैं यह भी जनता था की इस साधना को करने के लिए बड़ी मेहनत करनी पड़ती है।  क्यूंकि इस साधना का हमारी आध्यात्मिक उन्नति से गहरा सम्बन्ध है।  और यह प्रकृति का नियम है कि जब हम कोई भी ऐसा कार्य करतें हैं जो हमारी आध्यात्मिक उन्नति से जुड़ा है तो उसमें कई प्रकार की बाधाएं आती हैं।  और उन बाधाओं को दूर करना और उनके साथ लड़ना झगड़ना और इनके साथ यह साधना करना, यह बड़ा ही मुश्किल था।   यह गायत्री साधना से पूर्व आत्म शुद्धि क्रिया का विशेष महत्त्व व् आवश्यकता होती है।  ३ दिन की आत्म शुद्धि क्रिया के पश्चात जब हम गायत्री साधना में बैठते हैं तो उसका अधिक लाभ प्राप्त होता है क्यूंकि हम स्वयं के अंदर की नकारात्मक ऊर्जा, व्यक्तिगत बातें हों या भावनात्मक या आर्थिक परेशानियां को अपने अंदर से निकालने में सक्षम हो जातें हैं।

जब हम बाजार जाते हैं, खरीदारी करने, चीज़ें खरीदने तो इतनी परेशानियां नहीं आतीं हैं।  लेकिन जब हम  साधना के पथ पर आगे जाते हैं तो बहुत सी बाधाएं और परेशनियां आती हैं।  लोगों की यह मान्यता भी है की इस मार्ग पर आगे जाना अर्थात कुछ धार्मिक करने जैसा है कुछ या किसी एक पंथ से जुड़ने जैसा है।  जबकि जो वास्तविक अध्यात्म है वो इन सब चीज़ों से बहुत अलग है।  पश्चिम में लोग इस मार्ग से ज़्यादा जुड़ने लगे हैं।  वो आत्म चिंतन, आत्म विश्लेषण को महत्त्व देने लगे हैं और इससे सम्बंधित प्रश्नों जैसे ‘कौन हूँ मैं, क्या है मेरे जीवन का उद्देश्य’ जैसे विचारशील प्रश्नों पर चिंतन करने लगे हैं।  तो जो भारतीय हैं जो पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित हैं, पश्चिमी सभ्यता को मानते हैंऔर स्वयं को नास्तिक कहते  हैं, उनके अंतर्मन में भी यह प्रश्न उठता है।  और मैं यह मानता हूँ की जो लोग यह कहते हैं की यह जो आध्यात्मिकता है,  ध्यान और साधना है हम इसमें विश्वास नहीं रखते किन्तु अंदर ही अंदर वो भी चाहते हैं की उन्हें आतंरिक मार्गदर्शन मिले।

उन्हें लगता है की कोई उनका हाथ पकड़ कर उनका मार्गदर्शन करे।  लेकिन वे स्वीकृति की कमी महसूस करते हैं।  और यह जो स्वीकृति है यह हृदय से आती है।  जब हमारा हृदय अवरुद्ध होता है तो हम इसे स्वीकृति नहीं दे पाते।  कभी कोई आदमी कोई काम करता है और घर परिवार के लोग, गुरुजन जिनको उसके बारे में ज़्यादा जानकारी है कहते हैं की आप ऐसा न करें।  हमारे शुभ चिंतक हमें बताने की समझाने की कोशिश भी करते हैं किन्तु उसका ‘मैं’ सामने आ जाता है। वो समझता है कि मैं जो कर रहा हूँ वो बिलकुल ठीक है।  और वो अपने शुभचिंतकों की बातों का प्रयोजन नहीं समझ पता है।  इसे लचीलेपन की कमी भी कहेंगे। तो यहीं यह बात समझने की है कि यदि सामने वाले ने कोई बात कही है तो हमें उसे समझने का प्रयत्न करना चाहिए।

हमें उन्हें सुनना  चाहिए।  क्यूंकि मुश्किल तब आती है कि जब हम किसी की बात सुन रहें हैं और अगर ध्यान से उसे देखा जाए तो वास्तव में हम उनकी बात नहीं सुन रहे हैं।  हालांकि हम सुन रहे हैं  किन्तु मन में अपने विचार चल रहे हैं।  और हमारे खुद के विचार उस सुनने की क्रिया में बाधा बन रहे हैं।  अगर हम देखे ध्यान से तो पाएंगे कि हम खुद की ही बात खुद के ही विचार सुन रहे हैं।  जिस क्षण हम इस को समझ पाएंगे उस क्षण हम इससे बहार निकल कर वास्तव में दुसरे कि बात पूर्णतः सुन पाएंगे।  ये दोनों चीज़ों में बहुत अंतर है।  जिस समय कोई आपसे कुछ बात कह रहा है उस समय आपका मन एकदम शीशे की तरह साफ़ होना चाहिए।  क्यूंकि  शीशे के जैसा साफ़ मन स्वस्थ मन है और वो मन जिसमें स्वयं कीधारणाएं चल रहीं हों वो मन स्वतः नहीं है।  वो   बीमार मन कहलायेगा।  इसलिए जो वास्तविक आध्यात्म है वो यह कहता है की आप अपने हृदय चक्र को खुला  रखें।  और जब हम सीखने के लिए तैयार होते हैं तब हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।  ऐसा कोई शख्स नहीं है जिसने सब कुछ सीख लिया और यदि कोई ऐसा कहता है कि उसने सब कुछ सीख लिया तो उसने अपने विकास के द्वार बंद कर दिए।  हम निरंतर सीखते हैं जीवन में।  हर क्षण।  और जब हमें कोई कहता है कि आपको कुछ सीखना चाहिए चाहें वो कोई  छोटा बच्चा ही क्यों न हो हमें उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए, उसको समझना चाहिए।  क्यूंकि जब हम उसकी नहीं सुनते तो हम अपने अंदर ऐसा विचार करतें हैं की वो कितना छोटा है, कितने कम अनुभव वाला है, इससे हमारा क्या रिश्ता है, उसे पता ही क्या है जो मुझे सिखाएगा।  किन्तु सीखने की कोई उम्र नहीं होती और जिससे सीख लेनी है उसकी भी कोई उम्र नहीं होती।

तो इसलिए जहाँ से सीख आती है उसे हमें सीखना चाहिए।  यही कारण है कि पश्चिमी सभ्यता पूर्व से ज़्यादा तेज़ी से आगे बढ़ रही है।  जबकि जो सनातन सभ्यता है अगर उसकी हम बातकरें, ऋग्वेद की अगर हम बात करें जो सत्तर लाख साल पुराना है – वो सनातन  ही देन है।  लेकिन यहाँ से वो जाती जा रही है और पश्चिंम में लोग इसे समझने लगे हैं।  काफी देशों में जैसे की जर्मनी, जापान उन्होंने स्कूल सिलेबस में भी इसे उतारा है जैसे की गायत्री मन्त्र है या बहुत सी शिक्षाएं हैं उनको बच्चों को सिखाया जा रहा है।  तो कुछ तो बात है यहाँ के वेदों में, पुराणों में।  कुछ लोग कहते हैं यह कहानियां नकली हैं।  किन्तु पुराण का मतलब ही यह होता है की वो रूपक हैं और आप उन्हें समझ कर उनसे क्या शिक्षा लेनी है वो लें और उस सीख को जीवन में उतारें।

इसमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि कहानी सच्ची है या झूठी।जो चीज़ मायने रखती है वो यह कि उस कहानी से हमें क्या सीख मिल रही है।  उसे सबको खुले मन से स्वीकार करना चाहिए।

तो आज की जो हम साधना करने जा रहें हैं।  साधना का अर्थ भी कई लोग समझते हैं की हमें हाथ में जप माला पकड़नी है , मंत्रोच्चारण करने हैं , हमें किसी भगवान् की प्रतिमा के सामने बैठ कर ध्यान लगाना है, ऐसा बिलकुल भी नहीं है।  जो लोग खुद को विद्वान्, पंडित , महात्मा, कहते हैं उन्होंने पूरी तरह से साधना के अर्थ को, उसकी छवि को बिलकुल नष्ट कर दिया है।  और यही कारण है कि आज का युवा इससे जुड़ने में , आध्यात्मिक लोगों से जुड़ने में असमर्थ हो रहा है।  जो वास्तविक आध्यात्म है, वो पूर्णतः आंतरिक चेष्टा है, बाहर सब माया है , उस माया का अपना अर्थ है।  वो दूसरी चीज़ है।  आज की साधना की यदि हम बात करें तो उसकी जो शुरुवात है उसका जो तथ्य है वो ऋग्वेद से सम्बंधित है।  जैसा की हमने कहा कि ऋग्वेद सत्तर लाख साल पुराना है।  और ऋग्वेद में २४ अक्षरों की बात की गयी है।   जो यह बातें कही गयीं हैं यह मंडला 3. ६२. १० में इनकी चर्चा की गयी है।

आज हम उसकी बात करने जा रहे हैं क्यूंकि आज की हमारी साधना उसी पर आधारित है।  यह जो साधना है ये साधना की शुरवात होती है इंसान के अहंकार से।  अब आगे देखेंगे कि जो इंसान की ईगो होती है, उसका अहंकार होता है उसको यदि हम एक सही दिशा दिखा दें तो वह नर से नारायण हो सकता है।  जिसका जन्म निम्न स्तर की चेतना से होआ हो वो उच्च स्तर की चेतना तक पहुँच सकता है।  उसे प्राप्त कर सकता है।  और पूरी प्रकृति से सम्बन्ध स्थापित कर सकता है।  तो आज हम उसकी बात करेंगे।

एक राजा हुए कौशिक नाम था उन राजा का।  वो राजा बड़े ही अहंकारी प्रवृत्ति के थे।  उनके अहंकार का कारण  यह था की वो बहुत ही शक्तिशाली राजा थे।  किन्तु जो उनका अहंकार था वो उनकी शक्ति के बीच में बाधा था।  यह उसी तरह है जैसे एक व्यक्ति के पास सब कुछ हो लेकिन एक ईगो उसके पास आ जाये तो उसके पास जितनी भी शक्तियां हैं वो सब व्यर्थ हो जाती हैं।  ऐसे ही जो कौशिक राजा थे बहुत बड़ी सम्पदा, बहुत बड़ा साम्राज्य था उनका।  एक बार महर्षि वशिष्ठ के यहाँ वो प्रार्थना के लिए गए।  तो चाहें राजा कितना ही पराक्रमी क्यों न हो हमारे यहाँ एक परंपरा है की यदि आप सही मार्गदर्शन चाहते हैं तो आप एक गुरु का साथ पकड़ते हैं।  एक साथ चाहिए होता है गुरु का जहाँ से आपको सही मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

तो राजा कौशिक जब महर्षि वशिष्ठ के यहाँ जाते हैं तो बहुत खुले दिल से बहुत आवभगत से उनका स्वागत होता है।  उनकी बहुत खातिरदारी होती है।  उनकी सेना की भी बहुत खातिर होती है बड़ा सम्मान होता है।  राजा कौशिक जो हैं वो यह देखते हैं की इस ब्रह्मऋषि के पास किसी प्रकार की कोई सम्पदा नहीं है कुछ भी नहीं है, एक रूपया इसकी जेब में नहीं है पर इसके पास इतना सब ये कैसे है।  अब उसका पूरा ध्यान इसमें चला जाता है की इसके पास ऐसा क्या है जो यह इतना कुछ दे पा रहा है।  क्यूंकि राजा अपनेआप में एक बहुत धनवान चरित्रवान व्यक्ति था लेकिन ब्रह्मऋषि के पास जा कर उसने ये अनुभव किया की जो मेरे पास है, उससे कहीं ज़्यादा इन ब्रह्मऋषि के पास है।  क्यूंकि मेरा पूरा सैन्यबल और पूरा राज्य यहाँ उठ कर आया है और इतने प्रेम पूर्वक, इतना आदर सत्कार किया हमारा।   इतने भोजन व्यंजन, धन सम्पदा, इन सबका जो इन्होने हमें अनुभव कराया, यह बहुत चकित कर देने वाली बातथी।

जो अब राजा कौशिक है वो इस खोज में निकल पड़े।  तो उन्होंने यह पता लगाया की ब्रह्मऋषि वशिष्ठ के पास एक गाय है जिसका   नाम नंदिनी है।  और वो नंदिनी गाय कामधेनु का दिया हुआ वरदान है।  तो अब राजा कौशिक सारी बातें भूल कर उस नंदिनी  गाय के पीछे पड़ गया। ब्रह्मऋषि वशिष्ठ से कहने लगा की आप यह गाय मुझे दे दीजिये।  बहुत नम्रता पूर्वक, बड़ी ही विनम्रता से ब्रह्मऋषि वशिष्ठ ने कहा कि राजन ये गाय मैं आपको नहीं दे सकता।  क्यूंकि ये भेंट स्वरुप देवताओं के माध्यम से प्रार्थना करने पर मिली है।  परन्तु आसक्त राजा, अहंकारी राजा जब उसने ये बात सुनी, उसके  अहंकार को ठेस लगी और उसने सोचा कि मुझ जैसे राजा को मना करने वाला ये ऋषि होता कौन है।   बस यहीं से  आरम्भ है इस पूरी घटना का क्रम।

दोनों में बात इतनी हो जाती है की युद्ध की नौबत आ जाती है।  अब जब युद्ध कि नौबत आ जाती है तो बल पूर्वक  अहंकारी राजा चाहता है कि ब्रह्मऋषि से वो नंदिनी गाय छीन ली जाए।

लेकिन सबसे गहरी बात यह है कि जैसे ही वो लड़ाई करने  के लिए निकलता है चुटकी बजाते ही, कुछ ही पलों में उसकी सारी सेना को वो ब्रह्मऋषि समाप्त कर देते हैं।  अब ये और चकित कर देने वाली घटना आती है राजा के समक्ष। और वो कहीं से इसका सूत्र पाना चाहता है।  की ये है क्या।  तो किसी महर्षि की सलाह पर उसको यह ज्ञात होता है कि तुम शिव की आराधना  करो।  उनकी  साधना करो और जब साधना करके उस परम तत्त्व परमेश्वर शिव को प्रसन्न करोगे तो तुम्हारे जीवन में जो तुम चाहोगे तुम्हें मिलने लगेगा।  अब वो साधना में  बैठ जाता है।   कई वर्षों तक साधना में बैठने के पश्चात् एक दिन भगवन शिव प्रकट होते हैं। और भगवान  शिव प्रकट होतें हैं और  उसके समक्ष आते हैं।  और जैसे ही वो राजा  के समक्ष प्रकट होते हैं तो उनसे  वो राजा कहता है की मैं आपसे वरदान चाहता हूँ की मुझे नंदिनी गाय पाने का सामर्थ्य दें।  तो भगवन कहतें हैं की मैं तुम्हें नंदिनी  गाय तो नहीं दे सकता क्यूंकि वो  तो एक ही बनी है सारी सृष्टि में किन्तु मैं तुम्हें यह वरदान ज़रूर दे सकता हूँ की तुम कभी किसी से हारोगे नहीं।  तुम हार न देखो अपने जीवन में।  तो भगवन उसको आकाशिए शास्त्रों का ज्ञान  देते हैं। वो उसको एक ऐसी शास्त्र शस्त्र विद्या  देते हैं  जिससे वो कभी हारे ना। पर अहंकारी राजा साधना के पश्चात् भी वो गाय प्राप्त करने हेतु फिर जाता है ब्रह्मऋषि के पास, युद्ध करने के लिए।  पर इस बार और ज़्यादा सेना लेकर जाता है।  और सारी सेना को समाप्त करने के बाद जब उस राजा को वशिष्ठ अकेला छोड़ देते हैं तब उसे बड़ी ही बेज़्ज़ती का सामना करना पड़ता है।  तब वो और गहरी साधना करने निकल जाता है।  और वो इतनी साधना करता है, इतनी साधना करता है कि आप सभी परिचित होंगे की उनके तप काल में कई बाधाएं आती हैं, मेनका भी आती हैं, जो कि उनको मार्ग से विचलित करतीं हैं।  इसका वर्णन पुराणों  में भी है कि ऐसी बाधाओं के बावज़ूद भी वो राजा साधना में लगा रहता है।  और एक समय ऐसा आता है जब वो  राजऋषि  हो जाता है, ब्रह्म को उपलब्ध हो जाता है।

राजऋषि हो  उसके मस्तिष्क में एक बात होती है कि मैं ब्रह्मऋषि हो गया।  फिर वो उस विद्या को लेकर पुनः महर्षि वशिष्ठ के पास जाता है और पहले से बेहतर दिखता है।  तो महर्षि वशिष्ठ  देखते हैं और प्रसन्न होते हैं वो उसको राजा कह कर  राजऋषि कह कर बुलाते हैं।  और जब वो राजऋषि  कह कर पुकारते हैं तो पुनः राजा का अहंकार जागृत हो जाता है और वो कहता है कि आप मुझे राजऋषि कह कर ना पुकारें मैं ब्रह्मऋषि हूँ।  राजऋषि छोटा होता है एक राज का होता है, एक नगर का होता है , ब्रह्म ऋषि बड़ा होता है , जिसने ब्रह्म को जान लिया।  वो व्यक्ति बुद्ध हो गया।  वो क्षत्रिय राजा है , उसकी चेतना थोड़ी ऊपर उठती है लेकिन अभी भी राजा होने से वो अभिमान उसके भीतर है कहीं न कहीं।  और वो अंदर से थोड़ा सा राजा है।  और जब वो उस  महर्षि से कहता है की आप मुझे ब्रह्मऋषि बुलाएँ तो वो इस बात से इंकार कर देते हैं कि नहीं मैं तुम्हें ब्रह्मऋषि नहीं बुला सकता।  और ऐसा  बोलके ऋषि अपने घर और राजा अपने द्वार चले जातें हैं।  राजा का अहंकार इतना प्रबल हो जाता है कि वो सोचता है कि अब इस ऋषि का काम तमाम कर दो।  तो पूनम की रात को गुरुपूर्णिमा के दिन वो तलवार लेकर ब्रह्मऋषि वशिष्ठ की हत्या करने निकल पड़ता है।  अब वो झाड़ में छुपा बैठा है और प्रतीक्षा करता है की किस तरह ऋषि वशिष्ठ आएं और मैं उनका काम तमाम करूँ।

तो जैसे ही वशिष्ठ वहां से निकलते हैं सामने से एक ऋषि आते हैं और वो ऋषि कहते हैं कि आप उन्हें ब्रह्म ऋषि कह क्यों नहीं देते।  आप उन्हें राजा कौशिक को राज ऋषि कहते हैं।  आप उन्हें ब्रह्म ऋषि कह दें सारा झगड़ा ख़त्म हो जायेगा।  तो अब यहाँ जो वशिष्ठ कहतें हैं वो बड़ी ही गहरी बात है।  वो कहते हैं की उसके अंदर संभावना है ब्रह्मऋषि बनने की।  और वो ब्रह्मऋषि तो हो ही जायेगा।  लेकिन यदि आज ही मैंने इसको ब्रह्मऋषि कह दिया तो इसके पीछे जो मेहनत है वो उसे करना भूल जायेगा।  और यह मुझे पता है की वो ब्रह्मऋषि तो हो ही जायेगा उसके अंदर बहुत बड़ी संभावना है।  और मेरे हृदय में उसके लिए बहुत आदर है बस थोड़ी सी अकड़ है वो भी ख़त्म हो जाएगी।  और उसके अंदर लक्षण हैं, गुण हैं ब्रह्म ऋषि बनने के और एक दिन वो बहुत बड़ा ब्रह्मऋषि बन जायेगा।  इतना सुनते ही झाडियों  में छिपा राजा कौशिक महर्षि के चरणों में गिर जाता है और वो तलवार उसके हाथ से छूट जाती है।  वो रोने लगता है।  वशिष्ठ कहते हैं अरे ये क्या कर रहे हो राजन, उठो ब्रह्मऋषि! उस दिन पहली बार वो उसको ब्रह्मऋषि कहते हैं।  राजा कौशिक कहते हैं अब काहे का ब्रह्मऋषि अब कुछ नहीं हूँ मैं।  आप जानते नहीं मैं क्या करने आया था।  बोले वो छोड़ो तुम क्या करने आये थे पर अब जो तुमने कर लिया वो बहुत उत्तम कार्य कर लिया।  अब तुम मेरे चरणों में गिर गए।  तुम्हें झुकना आ गया।  और सही मायने में जिसे झुकना आ गया वही ऋषि है वही परम चेतना है।  यह सभी के साथ है।  इंसान का धन, इंसान का वैभव, इंसान की सम्पदा, यहि उसका सबसे बड़ा अहंकार है। परन्तु जिस क्षण उसे इस बात का बोध हो जाए कि इन सबसे परे भी कुछ है जिसके लिए मेरा जन्म हुआ है।  वो सबसे बड़ी प्राप्ति है।  और सही मायनों  उसी दिन से वो इस यात्रा पर निकल पड़ता है।  जो एक साधारण यात्रा नहीं है।  सभी मनुष्य जब पैदा होते हैं तो वो शूद्र होते हैं।  जैसे जैसे बड़े होते हैं उनमें क्षत्रिय के गुण आते हैं क्यूंकि यह जो जीवन है यह एक लड़ाई है।  संघर्ष है।  और संघर्ष जब मनुष्य जीवन में करता है तब उसमें यह गुण आते हैं।  अपनी जीविका चलाने के लिए वह वैश्य बनता है व्यापार करता है।  और उससे ऊपर जब उसकी चेतना उठती है तब वो ब्राह्मण बनता है।  ब्राह्मण से अर्थ यह है कि जिसने उस ब्रह्म को जाना।  आप ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए हैं इससे ब्राह्मण का कोई अर्थ नहीं है।  आप किस कुल, गोत्र, परिवार में पैदा हुए हैं। इससे कोई लेना देना ही नहीं है।  आपने अपनी चेतना का कितना विकास किया यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है।  अब वो कौशिक ऋषि से विश्वामित्र बन गए।  विश्वामित्र से अर्थात है विश्व का जो मित्र हो।  मैत्री भाव जब हमारे भीतर आता है तो मित्रता का भाव जगता है और जैसे ही यह भाव जगता है तो हम समस्त संसार के मित्र बन जाते हैं।  बुद्ध ने धम्म पद में भी इसकी बहुत चर्चा की।  जीसस ने भी इसके बारे में बहुत गहरी बातें की। तो अंत में यदि आप देखेंगे की जो सभी आध्यात्मिक गुरु हुए हैं उन सभी ने इस साधना की बात की है।  सबकी कहानियां और तरीके अलग थे।  यह ऐसे ही है जैसे किसी को दिल्ली आना हो तो कोई दक्षिण से, कोई पूर्व से आता है कोई पश्चिम की ओर से आता।  रास्ते अलग हों किन्तु जो मंजिल है वो एक ही है।  आप कहाँ से आ रहे हैं ये मायने नहीं रखता आप कहाँ पहुँच रहे हैं यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है।  तो यह साधना का पथ जो राजा कौशिक को विश्वामित्र बनता है इसकी बात की गयी है पुराण में – इसको सावित्री का नाम दिया गया।  सावित्री से यह अर्थ है की जो सूर्य है सूर्य की हज़ारों किरणे जब हमारी चेतना के भीतर प्रवेश करें तो वो सवित्र है।  और मनुस्मृति  में इसके बारे में यह बताया गया है कि इस साधना से बड़ी कोई साधना है नहीं।  सावित्री साधना – नाम दिया गया है मनुस्मृति में इसे।  यह जो साधना है इसमें तीन लोकों की बात की गयी है, भू, भुवः, स्वः – पृथ्वी, आकाश और अंतर्मन।  इसको अगर हम अध्यात्म की भाषा में समझें तो यह है – अस्तित्व, चेतना और परमानन्द।  अभी अनुभव करतें हैं इस चीज़ का।  बस इस बात पर ध्यान केंद्रित करें की आप बैठे हैं,  यह आपका अस्तित्व है।  यह पहली बात है , अब इस बात पर ध्यान दें की आप क्या देख रहें हैं और क्या कर रहे हैं यह आपकी चेतना है फिर इस बात पर ध्यान केंद्रित करें की आप का अंतर्मन है।  आपके अंतर्मन में इस वक्त क्या अनुभूति है , यह परमानन्द की अनुभूति है।

यह जो तीन चीज़ें हैं, पृथ्वी, आकाश और अंतर्मन – अस्तित्व, चेतना और परमानन्द। यह हमारे साथ हर क्षण जब तक यह मन है, जब तक यह शरीर है, तब तक और इसके बाद भी, यह तीन हमारे साथ सदैव हैं। जो भी बुद्ध पुरुष हुए, उन्होंने इस चीज़ को जाना।  चाहे वो बुद्धा हों, महावीर हों, विश्वामित्र हों, राजा जनक हों, उन सबने ने इसको जाना।

क्यूंकि जब हमारे पास पैसा होता है, धन होता है, जायदाद, जमीन है, पद है, सब है, उसका भोग करने के बाद आदमी कहीं कमी महसूस करने लगता है।  और जहाँ वो संतोष की कमी महसूस करने लगता है वो एक जिज्ञासा में आता है, एक खोज में आता है।  एक जांच में आता है, मैं कौन हूँ के प्रश्न उठते हैं उसके अंदर तब वो एक ऐसे परिवेश में आता है जिसमें उसे इस बात का आभास होने लगता है की मेरे पास जो कुछ भी है उससे अधिक महत्वपूर्ण, उससे अधिक गहरा भी कुछ है।  क्यूंकि अगर जो मेरे पास है अगर उसी से पूरी प्रसन्नता और आन्नद मिलता तो मैं कभी जीवन में दुःख का अनुभव नहीं करता।  तो जो दुःख का अनुभव है वो प्रथम सीढ़ी है आपको आध्यात्म की ओर ले जाने में।  परम चेतना से जोड़ने की प्रथम सीढ़ी।  तो जितनी भी बुद्धिमत्ता है वो इन २४ अक्षरों में, यह जो २४ बीज हैं इनमे हैं।  इसको ऐसे समझे की अनंत जल है संसार में।  बहुत सारी नदियाँ, हर तरफ से बह रहीं हैं किन्तु वस्तुतः वो समुद्र में ही जाकर मिलती हैं।  उसी प्रकार बहुत सारे मन्त्र हैं और वो मंत्र नदियों की भाँती  आपकी चेतना में प्रवेश करते हैं और वो जो समुद्र है वो आपकी चेतना है यहाँ उसकी बात की गयी है।  तो अगर मन्त्र का मतलब समझें तो वो है – मन – त्र जो आपके मस्तिष्क से सम्बंधित है जो आपके मन में एक नया प्रतिरूप बनाता है।  जो पुरानी विचारधारा को बदलता है जो आपने जाने अनजाने में बना लिया है।  तो मन्त्र वास्तव में आपको स्वयं से अवगत कराने में, स्वयं को जानने  में सहायक होता है।  तो यह जो एक मन्त्र की अवस्था है वो २४ घंटे की अवस्था है।  जब आप शांत स्थिति में हैं और अंदर बाहर साँसे ले रहे हैं एक तालमेल में, तो उसका भी अपना एक मन्त्र है।  उसे सोऽहं मन्त्र कहते हैं।  ध्यान करते समय यदि आप ध्यान की गहराई में जाएँ तो यह मन्त्र आपको सुनाई देगा।  वह ध्वनि वास्तव में मन्त्र है।  तो जब आप पुरे ध्यान और पूरी जागरूकता के साथ बैठे होते हैं तो वो भी एक मन्त्र है।

ऐसा हम एक गुरु के निर्देश में गायत्री साधना के माध्यम से अनुभव कर सकते हैं।

आप सबका मंगल हो और इस साधना के माध्यम से चेतना और अधिक जागरूक हो, ऐसी शुभकामानएं और आशीर्वाद।


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