गुरु पूर्णिमा: गुरु एक दर्पण

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गुरु पूर्णिमा पर सद्गुरु की महिमा

आज का दिवस एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और प्रेम से भरा हुआ दिवस है और इस प्रेम पूर्ण दिवस पर गुरु पूर्णिमा का जो आज उत्सव है, वो बहुत ही आनंद और प्रेम का उत्सव है। यह जो जीवन हमें प्राप्त हुआ है, यह अन्धकार से भरा जीवन है। और इस अन्धकार से भरे जीवन में उस परमात्मा ने कुछ क्षण ऐसे दिए जो दिव्य रौशनी का प्रतीक हैं, जो हमारे जीवन में उजाला लेकर आते हैं। आज जो दिवस है जिसे हम गुरु पूर्णिमा के नाम से जानते हैं, वो कई मायनों में बड़ा महत्वपूर्ण दिवस है। जिस प्रकार एक अँधेरी रात में चन्द्रमा का उदय होता है जिसे हम पूर्णिमा के नाम से जानते हैं, उसी तरह हमारे जीवन में भी एक दिवस ऐसा आता है जिसे हम गुरु पूर्णिमा के नाम से जानते हैं। जब एक मनुष्य जन्म लेता है , तब उसका जीवन इस आकाश की तरह होता है, जिस प्रकार बिना चन्द्रमा की रात्रि में कुछ दिखाई नहीं देता उसी प्रकार साधारण जीवन में भी सिवाय अन्धकार के और कुछ भी नहीं। यदि आप आकाश को देखें तो चन्द्रमा की जो स्थिति है वो निरंतर परिवर्तन शील है। उसमें एक दिवस अमावस्या का है वो घनघोर रात है। फिर एक दिन ऐसा आता है की चन्द्रमा अपनी पूरी आभा के साथ प्रकट होता है और सब जगह अपनी रौशनी, अपनी प्रतिभा और अपनी चांदनी को बिखेरता है। आज का जो दिवस है गुरु पूर्णिमा का दिवस महाकाव्य में इसकी तुलना चन्द्रमा से की गयी है। आज का पहला ऐसा दिवस है जिस दिन पहली बार बोध प्राप्त करने के बाद बुद्ध ने उन शिष्यों को खोजा जिन्हे उन्हें ज्ञान देना था। और जिस प्रकार उन्होंने अपने शिष्यों को खोज उनके जीवन में बोध की यात्रा का प्रारम्भ किया उसी तरह एक गुरु का यह कर्त्तव्य है, यह दायित्व है कि जो भी उनके पास आये जो भी उनके संसर्ग में आये वो उसे अपनी दिव्य ज्योति से प्रभावित करें, आनंदित करें। कबीर बहुत सुन्दर बात कहते हैं,

‘गुरु गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पाए। बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताये।

इस दोहे के कई अर्थ हैं। एक अर्थ तो यह है कि शिष्य सामने खड़ा है और गोविन्द और गुरु दोनों उसके सामने खड़े हैं तो वो इस दुविधा में है कि मैं किसकी वंदना करूँ गुरु की, की गोविन्द की? तो गुरु इस दुविधा को देख कर कहतें हैं कि तू परमात्मा की वंदना कर, गोविंद की वंदना कर।

क्यूंकि गुरु एक ऐसी शक्ति है, उस ईश्वर की बनायी हुई ऐसी मूर्ति है जो सभी प्रकार के मोह के बंधनों से राग द्वेष से शिष्य को मुक्त करती है। उसने इस दोहे का अर्थ ही बदल दिया। शिष्य कहता है कि गुरु और गोविन्द दोनों खड़े हैं और अगर मेरे भीतर यह दुविधा है की मैं किसके चरणों की वंदना करूँ, किसके चरणों को पकड़ूँ, तो मैं उस गुरु के चरणों को पकड़ता हूँ जिसने उस परमात्मा की पहली झलक दिखने में मेरा मार्ग दर्शन किया। और फिर उसके बाद कहता है की बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताये। कि मैं उस गुरु की वंदना करता हूँ, उस पर बलिहारी जाता हूँ जिसने मुझे उस परमात्मा से मिलाया। जिसने मुझे सत्य का बोध कराया। गुरु जीवन में मृत्यु देता है। सद्गुरु के पास जाना सबसे कठिन कार्य है क्यूंकि सद्गुरुतुम्हेँ मृत्यु देता है। वो किसी भी प्रकार से तुम्हारी इच्छाओं को, तुम्हारी वासनाओं को, तुम्हारी महत्वाकांछाओं को किसी भी तरह से पोषित नहीं करता अपितु उन्हें तिरोहित करता है। उन्हें तिरोहित करने का जो पूरा कार्य है वो गुरु का ही कार्य है और जीते जी मृत्यु सिखाना यही गुरु का कार्य है। क्यूंकि मृत्यु तो निश्चित है। यदि गुरु शरीर रूप में आया है और शिष्य भी शरीर में आया है तो शरीर की मृत्यु तो निश्चित है। वो आज नहीं तो कल जायेगा। तो जीते जी उस शरीर में रहते हुए मृत्यु का बोध कर लेना यह गुरु का कार्य है। मैं तुम्हे किसी भी प्रकार से भ्रम में नहीं रखता। मैं तुम्हारी इच्छाओं को कभी पोषित नहीं करता, मैं तुम्हारी महत्वाकांक्षाओं को कभी बल नहीं देता। और उसकी पूरी चेष्टा यही रहती है कि तुम इस जीवन काल में उस परम सत्ता से आविर्भूत हो। उस दिव्यता का प्रकाश अपने स्वयं के भीतर अनुभव करो। बहुत सारे लोग गुरु से यह अपेक्षा रखते हैं की मेरे जीवन में सुख आ जाये, ऊँचा पद मिल जाए, धन आ जाये, महल आ जाये लेकिन सच्चा गुरु तुमसे इससे भी गहरी यात्रा की बात करता है। जो जीवन में तुम्हे सुविधा देता है ।

जो जीवन में तुम्हें आश्वासन देता है वो पंडित पुरोहित तो जीवन में बहुत मिल जातें हैं जो तुम्हारी हाँ में हाँ मिलाते हैं। तुम जैसा चाहो उसी में तुम्हें राजी कर और यह कह कर की जीवन में जो कुछ संकट हैं उनसे मुक्ति मिलने वाली है और आगे का जीवन बहुत सुन्दर होगा। बहुत कुछ मिलेगा जीवन में। बिलकुल निश्चिन्त रहो। राम राम का नाम जपने लगो, कोई चालीसा पकड़ा देगा, कोई माला कंठी पहना देगा और कहेगा की बिलकुल निश्चिन्त रहो। किसी प्रकार का भय, चिंता मत करो। मरते वक्त भी अगर राम नाम ले लिया तो जैसे अजामिल का कल्याण हुआ तुम्हारा भी हो जायेगा। और कुछ नहीं तो अंतिम समय किसी पंडित को बुला कर कान में गायत्री मन्त्र फुंकवा देना , गजेंद्र मोक्ष का पाठ करा देना। यह सब बेईमानों की तरकीबें हैं। क्यूंकि जिस प्रकार के बेईमान शिष्य हैं उसी प्रकार बेईमान गुरु भी हैं इस संसार में। और यह बेईमानी का धंधा बहुत सदियों से चला आ रहा है। यही बच्चों ने बड़ों को करते देखा और वो ही अपने जीवन में आगे उस बेईमानी को बढ़ाते गए। लेकिन सच्चा सद्गुरु जीते जी तुम्हें उस परम सत्ता का अनुभव कराता है। तुम इस जीवन में आये हो कुछ जानने के लिए कुछ पाने के लिए। यह जो क्षण हैं ये बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं इनको युहीं ज़ाया मत करो। बहुत लोग सोचते हैं कि एक बार जीवन में धन कमा लेते हैं पद कमा लेते हैं और जब अंत में हमारे पास सुख सुविधाएँ हो जाएंगी तब ईश्वर का स्मरण करेंगे तब स्वयं के बारे में सोचेंगे। लेकिन ये करते करते अभ्यास इतना गहन हो जाता है कि अंत में आकर वो इस इच्छा से मुक्त नहीं हो पाते हैं। और ये भूल ही जातें हैं की जिस सुविधा के लिए हमने इतना धन इकठ्ठा किया था आज वही सुविधा हमारी आदत बन गयी है आज हम एक भी क्षण उसके बिना रह नहीं सकते। एक बहुत सुन्दर बोध कथा है।

यह येत वन की कथा है। एक बार महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों को प्रवचन दे रहे थे। येत वन से एक पक्षी रोज़ सुबह उसी समय आकर बुद्ध का प्रवचन सुनता था। शिष्यों ने बहुत समय तक इस क्रिया को देखा और उन्होंने ये जानना चाहा। तो उन्होंने बुद्ध से पूंछा की भगवन यह पक्षी येत वन से रोज़ आपका प्रवचन सुनता है। नित्य प्रति ये आपका प्रवचन सुनने आता है और जैसे ही आपका प्रवचन पूरा होता है यह उड़ जाता है। बुध्द ने कुछ क्षण उस पक्षी को देखा और उसके पश्चात् बोले, ‘भंते, यह पक्षी अपने पूर्व जन्म में एक बहुत बड़ा नगर सेठ था। और इसके जीवन में अनेक बुध्द पुरुष अलग अलग जगहों से आये। पर इसने उन सद्गुरुओं की बात न सुनी और अपने कार्य में ही पूरी तरह से संलग्न रहा। और वो आश्रम से जो इसके जीवन में बुध्द पुरुष आये उनके वचनों से यह वंचित रह गया। लेकिन इसकी स्मृति में उन बुद्धों का ज्ञान था , और इसी के कारण इस जन्म में उसको स्मृति बोध हुआ और उससे इसके मन में भाव बोध उत्पन्न हुआ। भाव बोध होने के बाद इसके जीवन में जाग्रति आयी की जो कार्य मानव जीवन में नहीं कर पाया वो पशु जीवन में मैं कर सकता हूँ। इसलिए यह वो व्यक्ति है की जब सेठ था तो धन अर्जित करने में, अपनी वासनाओं को पूरा करने में और सभी प्रकार से अपने परिवार, अपने बच्चों, अपने पिता सबके लिए जीता रहा किन्तु स्वयं के लिए ना जी पाया और इस कारण यह पक्षी बन कर अब इस जीवन में हमारा प्रवचन सुनने आता है।

हमारा जीवन भी ऐसा ही है। हम भी अपने जीवन में इतने तल्लीन हैं की कुछ क्षण स्वयं के लिए भी निकालना बड़ा दुर्लभ है। और प्रश्न यह उठता है कि हम किस जगह खड़े हैं। क्या हम भी अपने जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ती में लगे हुए हैं। क्या हम भी इस संसार में इतना खो गए हैं कि हमें अपने वास्तविक स्वरुप से पहचान होनी असंभव हो चुकी है। यह एक बड़ा ही गहरा प्रश्न है। और यह ही हमारे जीवन की सबसे गहरी यात्रा है। इसलिए जब सच्चा सद्गुरु जीवन में आये तो उसकी ज्योति में स्वयं को डुबो लेना। स्वयं को समर्पित कर देना। उथला उथला सिर्फ बुध्दि तक ही नहीं। अपने सर पर उसको बैठा लेना। कबीर एक बड़ी सुन्दर बात कहते हैं, ‘गुरु को सर पर राखिये चलिए आज्ञा माहीं कही कबीर तदास को तीन लोक डर नाहीं’ कबीर गुरु को सर पर रखने की बात कहते हैं। बहुत गहरी बात है। इससे एक बात जो समझ में आती है वो यह है की गुरु को अपने सर पर स्थान देने के लिए कह रहें हैं। गुरु जो बात करें उसको अपनी बुद्धि में डाल लेना। उसको अपने भीतर जाने देना।

एक बालक कक्षा में था और कक्षा की जो अध्यापिका थीं उन्होंने उसको सजा दी। जब सज़ा दी तो कहा तुम कक्षा से बाहर जाकर खड़े हो जाओ। वो बाहर गया तो एक छात्र पहले से वहां खड़ा हुआ था। वो उससे पूंछता है की तुमने उस अध्यापिका की बात मान ली ? तुम बाहर आकर खड़े हो गए। तो वो बालक कहता है कि मैं सिर्फ बाहर आकर खड़ा हूँ, मैंने इसकी आज्ञा नहीं मानी। अंदर से मैं अभी भी बैठा ही हुआ हूँ। सद्गुरु की तुम जब बात सुनों तब तुम सिर्फ बाहर से ही आज्ञा ना मानो , भीतर से भी उनकी आज्ञा का पालन करो उसको अपनी बुद्धि में भी स्थान दो। कबीर जो उससे बुद्धि में स्थान देने की बात करतें हैं उससे यह समझ में आता है कि जब तुम उसे अपनी बुद्धि में स्थान देते हो तो धीरे धीरे एक क्षण ऐसा आता है वो बुद्धि से तुम्हारे हृदय में अपना एक स्थान बना लेता है। फिर तुम पूरे वो हो जाते है जो गुरु चाहता है। फिर तुम पूरे तिरोहित हो जाते हो। जैसे ही तुम्हारा मय तिरोहित होता है, उस क्षण परमात्मा का तुम्हारे भीतर प्रवेश होता है। गुरु तुम्हारे भीतर जाकर तुम्हारे मय को तिरोहित कर देता है और फिर उस परम का आह्वाहन करता है।

इसलिए जब कबीर यह कहते हैं की ‘कहे कबीर तदास को तीन लोक डर नाहीं’ तो जो तीन लोकों की बात कही वो तीन लोक कोई और नहीं तुम्हारा तमस, रजस और सत है। क्यूंकि हमारे अंदर के जो गुण हैं वही सबसे बड़ी बाधा हैं हमारे जीवन की। और जब हमनें उस परम सत्ता को स्वयं के भीतर प्रवेश दे दिया तो वो जो रोशनी है वो अन्धकार को पूरी तरह से निगल जाती है। और जैसे ही वो अन्धकार उस रौशनी के संलग्न में आता है अन्धकार अपना अस्तित्व खो देता है। गुरु की तुलना चन्द्रमा से की गयी। पूनम का चन्द्रमा, पूनम का चाँद। अब यह बात सुनने में बहुत विरोधाभास् लगती है। कि चन्द्रमा की रौशनी तो सूर्य की रौशनी है। क्यूंकि सूर्य परमात्मा है। और सूर्य का तेज अपना तेज है। गुरु का तेज अपना तेज नहीं है। गुरु का तेज सूर्य का तेज है। इसलिए गुरु को परमात्मा समझने की भूल कभी न करना। गुरु तो एक आईने के सामान है। जिस प्रकार तुम एक दीपक रखो और दीपक रख के तुम आईना उसके सामने रखो और आईने में तुम्हें जो प्रतिमा दिखती है, जो छवि दिखती है निर्मित होती हुई दीपक की, तुम उसी को दीपक नहीं समझते। गुरु का काम शीशे से कोई बहुत ज़्यादा नहीं है। उसकी पूरी चेष्टा यही है की अन्धकार भरे उस जीवन में वो चन्द्रमा की भांति तुम्हारे जीवन में प्रकाश करे। तुम चन्द्रमा को देखो तो वो पूरे दिन सूर्य की रौशनी को पीता है और रात को अपनी रौशनी बिखेरता है। गुरु को चन्द्रमा इसलिए कहा गया है की कभी वो भी तुम्हारी तरह ही था।

तुम्हारे जीवन की तरह उसके जीवन में भी तुम्हारी तरह ही दुःख, पीड़ाएँ, तुम्हारी तरह ही वो उस राह में भटका जिस तरह से तुम भटकते हो। तुम्हारी तरह ही वैश्यालय, मधुशाला, सब जगह का जो रास्ता है उसने अपने जीवन में देखा। उन सभी जगहों का अनुभव करने के बाद उसने अपना एक मार्ग बनाया जिस मार्ग पर चल कर उसे वो सूर्य के समान जो तेज था उसे अपने जीवन में उतारा। जो सच्चा गुरु है वो तुम्हारे कष्ट पीड़ाओं सभी को समझता है क्यूंकि कल वो भी वहीँ था जहाँ आज तुम हो। वो जानता है की आज जो परेशानियां तुम्हारे जीवन में हैं कल इनका अंत हो सकता है ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार उसने अपने जीवन में उन सभी परेशानियों का अंत किया। जहाँ तुम्हारा अहंकार तिरोहित हुआ, जहाँ तुम्हारी वासनाएं तिरोहित हुई वहां तुम उस परमात्मा की झलक पाने लगे। वहां उस दिव्यता के दर्शन होने लगे। इसलिए अगर कोई ऐसा जीवन में क्षण आये जहाँ पर मन और बुद्धि कोई काम न करने लगे और हृदय से संवाद होने लगे तो समझना की एक सच्चे गुरु, एक सद्गुरु की शरण में आ चुके हो। कभी हमारे जीवन में परेशानी आये क्यूंकि यह तो जीवन है इसमें तो दुःख और सुख दोनों की ही यात्रा है तो कबीर कहतें हैं, ‘हरी रूठे गुरु ठोर है , गुरु रूठे नहीं ठोर।’ वो कहते हैं की परमात्मा तुमसे रूठ जाएँ तो तुम्हारा काम चल जायेगा क्यूंकि तुम्हारे पास कोई है तुमको बचाने के लिए। गुरु एक सेतु का काम करता है। इस छोर की यात्रा प्रारम्भ करने के लिए तुम्हे एक सेतु निर्माण करना पड़ता है। उस सेतु निर्मित करने में गुरु बड़ा सहयोगी होता है। इसलिए कहते हैं की यदि परमाता कभी रूठ जाये तुमसे तो गुरु तुम्हे बचाने के लिए आएगा लेकिन गुरु तुम्हारे जीवन में यदि रूठ जाए तो तुम्हारे पास कोई है नहीं। इस बात से तात्पर्य है की जब हम सेतु निर्माण करते हैं तो जहाँ से हमने प्रारम्भ किया है, जहाँ से हमने समर्पण किया है वो ही सबसे महत्त्व पूर्ण पल है हमारे जीवन का। और जब हम पूरी तरह से समर्पित होकर शुद्ध भाव से निर्मल भाव से, आत्म समर्पण का भाव जब हमारे अंदर पैदा होता है तो उसके बाद ही जो वास्तविक यात्रा है, जो सत्य की यात्रा है, जो परमात्मा की यात्रा है, उसका प्रारम्भ होता है। उस अँधेरी रात में जो जीवन की अमावस्या है उसके बाद जो पूनम का चन्द्रमा लेकर आये, वही सद्गुरु है।


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